लक़ीर खींचने जितना आसान नहीं है J&K का परिसीमन

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किसी कागज पर लक़ीर खींचना और ज़मीन पर सरहदी लक़ीर खींचना दो अलग-अलग बात है | कागज पर खींची लक़ीर के अपने मायने है और ज़मीन पर खींची लकीरों के अपने मतलब | जिक्र है जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का (Delimitation of Jammu and Kashmir ) | बोल देने जितना न कभी आसान था न कभी होगा | ऊपर से मामला जम्मू-कश्मीर का जिसकी कुल 111 विधानसभा में 24 पाक अधिकृत कश्मीर के लिए ख़ाली है | परिसीमन का मतलब है इलाकों का सियासी बंटवारा यानी सरल शब्दों में कहे तो किस विधानसभा का दायरा कहा तक फैला है और कौन-कौन सी विधानसभा किस लोकसभा के कब्जे में है इसका फैसला परिसीमन दवारा किया जाता है| 1995 में परिसीमन आख़री बार हुआ था और फिर कानूनन हर दस साल में इसे दोहराया जाना था| 2005 में नहीं हुआ, क्योंकि 2002 में तत्कालीन सीएम फारुख अब्दुल्लाह ने कानून में फेरबदल कर इसे 2026 तक टाल दिया (Delimitation In Jammu & Kashmir)|

अब 2019 में बीजेपी की मोदी सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने अपने पहले एक्शन के रूप में इस ओर रुख किया है| परिसीमन की कवायद से मौजूदा सरकार को जो फायदा हो सकता है उसका गणित कुछ यूँ है- जम्मू क्षेत्र में 37 विधानसभा सीटें हैं | 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यहां 25 सीटें जीती मतलब यहाँ बीजेपी का दबदबा है| परिसीमन हुआ तो खाली पड़ी 24 सीटें जम्मू क्षेत्र में जुड़ेंगी जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा | ऐसे में साफ है कि बीजेपी आगामी विधानसभा चुनावों जो संभवतः अक्टूबर-नवम्बर 2019 में हो सकते है के पहले इस बात पर क्यों आमादा है ? यही कारण भी है विपक्ष का इसके खिलाफ होने का | जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती परिसीमन को सांप्रदायिक आधार पर राज्य को बांटने के तौर पर पेश कर रही है | ऐसे में परिसीमन की बात कर रही सरकार आर्टिकल 370, 35A और भारतीय और कश्मीरी संविधान की विसंगतियों को एक प्लेटफार्म पर कैसे लाएगी यह एक बड़ा सवाल है| जम्मू-कश्मीर को भारत में अन्य राज्यों के मुकाबले कई विशेष अधिकार मिले हुए है उनका क्या होगा ?

आर्टिकल 370– अगर सरकार जम्मू-कश्मीर के प्रति फिक्रमंद ही है तो पहले जम्मू-कश्मीर के झंडे को भारतीय झंडे में तो बदले, नागरिकों की दोहरी नागरिकता का क्या होगा ? यहाँ भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं है और सर्वोच्च अदालत के आदेश यहाँ मान्य नहीं | जम्मू-कश्मीर की महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म और वहीँ कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती है, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाएगी, कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता और भारतीयों को वहां ज़मीन तक खरीदने का अधिकार नहीं| विधानसभा का कार्यकाल 6 साल, पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं जैसे कई कानून है जो भारत के संविधान से मेल नहीं खाते | ऐसे में क्या सिर्फ परिसीमन कर एक राज्य को विकसित कर देने का दावा सच प्रतीत होता है? कुल मिलाकर सूबे और अवाम की भलाई का मुद्दा न हो कर परिसीमन अब सियासी फायदे-नुकसान का सबब बन चूका है| लेकिन जम्मू-कश्मीर का परिसीमन वो भी देश और सरहदों के मौजूदा हालात में फ़िलहाल हलुआ न होकर टेढ़ी खीर ही है…………

किस सरकार में दम है कि वह यह नीति लागू करे

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