कोरोना नही सिखाता आपस में बैर रखना

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चीन से आई लाईलाज बीमारी कोरोना ने पूरी दुनिया में लॉक डाउन मचा रखा है. इसके दौरान 21वीं सदी की दुनिया के साथ अजीब सा मजाक ही हुआ. यहीं हाल भारत और भारतीयों का भी है. भागदौड़ भरी जिंदगी थम सी गई थी और वो भी इस कदर की हर तरफ सिर्फ सन्नाटा . हर एक शख्स घर में कैद था और परिंदे आकाश में आजाद . टाइम नहीं है कहने वाले इंसान की जिंदगी में फुर्सत इतनी आ गई थी की समय काटे नहीं काट रहा था और विडंबना यह थी कि कदम रिश्तेदार और हिस्टेशन की और तो छोडो घर की दहलीज की और भी नहीं बढ़ रहे थे .एक सन्डे का मोहताज आदमी अब ऑफिस खुलने का रास्ता देखने लगा . यह आलम महज दस पंद्रह दिनों में ही हो गया था . बाहर गए तो कोरोना आ जायेगा और कोरोना नहीं आया तो पुलिस की लाठी इस बार गरीब अमीर का भेद भुला कर सबके साथ समान व्यवहार कर रही थी. वैसे कोरोना ने भी अमीर गरीब में भेद नहीं किया था. क्या फ़िल्मी सितारें और क्या राज नेता , मौलवी पुजारी, डॉक्टर्स, वकील, हिन्दू-मुस्लिम, बंगले वालों के साथ-साथ गरीब की झोपडी भी कोरोना की दहशत में थी . मानों कोरोना ने सोच रखा है कि भगवान् का बनाया हर इंसान समान है. किसान और जवान के बल पर छाती तान कर रहने वाले मुल्क के लिए कोरोना ने डॉक्टर्स और पुलिस के महत्त्व और जिम्मेदारी को समझाया.  

हिंदुस्तान जैसे बड़े देश के लिए जो जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होगा कोरोना कई और मायनो में भी चुनौती है. सियासत, मजहबी मनमुटाव और अज्ञान हमेशा की तरह इस बार भी भारत की दुखती नस साबित हो रहे हैं. यकीनी तौर पर कहा जा सकता है कि भारत के लिए कोरोना के आलावा उसकी अपनी समस्या यथावत ही है मसलन मजहब के नाम पर आपस में बैर भारत में कभी नया नहीं रहा . पुलिस और डाक्टर्स पर हमले और कोरोना को फ़ैलाने की कवायद के वीडियो और उनसे जुडी खबरों के साथ अफवाहों के सिअलब ने एक बार फिर भाईजान को भाई से दूर कर मजहबी खाई को और गहरा कर दिया है. लाक डाउन में आई ईद की सेवैयाँ भी इसी जहर के कारण मीठी नही रही.

कोरोना ने कई मायनो में परिभाषाएं बदली .

कोरोना ने जंगल के कई नियम इंसानों पर लागु किये है . ताकतवर ही जिन्दा रहेगा और कमजोर की इस दुनिया में कोई जगह नहीं , कितना भी धन कम लो आप अपने लिए एक पल नही कम सकते , कुदरत की शक्ति इंसानी शक्तियों से एक दो नही लाखों गुना ज्यादा है , विकासवाद, तरक्की की चाह ही इन्सान के वजूद के खात्मे की वजह हो सकती है , कुदरत खुद ही सब ठीक करना चाहती है, और भी ऐसे कई सत्य यथार्थ रूप में विश्व ने इस दौरान देखें और महसूस किये है . लाक डाउन के दौरान ही WHO की रिपोर्ट आई की पर्यावरण 11 से 12 फीसदी स्वच्छ हुआ . विश्वभर की नदियों का पानी इस दौरान 11 फीसदी साफ हुआ. भारत में दिल्ली के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा की वायु प्रदुषण में विश्व भर में अव्वल इस शहर ने लम्बे अरसे बाद आसमान में सितारें इस दौरान ही देखें. यहाँ कतई कोरोना की अच्छाईयां नही गिनवाई जा रही है वरन इंसानी बुराइयाँ पर रौशनी डालने की चेष्टा की जा रही है.

लेकिन यकीनन अब देर हो चुकी है और अब सब समय और भगवान् भरोसे ही है क्योकि लाक डाउन के अगले  चरण तक भारत सहित दुनिया के सभी मुल्क मिलाकर भी कोरोना का इलाज नही ढूढ सके है. फिलहाल जरुरत है सावधानियों की, अफवाहों पर ध्यान न देने की और हां दुरी बनाये लेकिन जिस्मानी तौर पर मजहबी और दिली दूरियां बढ़ने से कोरोना के अलावा कई बीमारियाँ समाज को हो जाने का खतरा है. कोरोना  आया है सो जायेगा भी लेकिन इसके निशान लम्बे समय तक देश और दुनिया के जहन से मिटने वाले नही है…   

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