चिकित्सा क्षेत्र में लगातार होते नए प्रयोग

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अमरीका के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा उपकरण विकसित किया है, जो शरीर के क्षतिग्रस्त अंग की चिकित्सा की मदद करने के अलावा उसके पुनर्निर्माण में भी मदद करेगा। खास बात यह है कि यंत्र अपना कार्य करने के बाद शरीर में ही नष्ट भी हो जाएगा। इस तकनीक को बायो-इलेक्ट्रॉनिक मेडिसिन नाम दिया गया है। यदि यह तकनीक उपयोगी रही तो इससे विभिन्न रोगों के उपचार का एक नया दरवाज़ा खुल जाएगा।

यंत्र को नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के न्यूरोसर्जनों ने बनाया है। प्रयोग के दौरान इस डिवाइस के जरिये चूहों में सर्जरी के बाद चोटिल नसों को नियमित रूप से विद्युत तरंगें पहुंचाई गई। इससे उनके पांवों की नसों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया तेज़ हुई। यंत्र का आकार सिक्के के बराबर है और यह सामान्य कागज जितना पतला है। यंत्र दो हफ्तों तक काम करेगा और इसके बाद ही शरीर में घुल जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक दिन यह तकनीक मनुष्य की विभिन्न बीमारियों के इलाज़ में नई क्रांति लाएगी।

बायो-इलेक्ट्रॉनिक मेडिसिन यंत्र शरीर के उन्हीं हिस्सों में इलाज़ करेगी, जहां उसकी ज़रूरत होगी। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे शरीर में किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं होगा। नॉर्थ वेस्टर्न विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और इस अध्ययन से जुड़े जॉन रोजर्स का कहना है कि इस तरह के उपचार से हम दवाओं और रसायनशास्त्र के अलावा दूसरे विकल्पों के बारे में भी सोच विचार कर सकते हैं। हालांकि अभी विकसित उपकरण को इंसान पर परखा नहीं गया है, लेकिन इससे भविष्य में चोटिल नसों के मरीजों के उपचार के लिए एक बेहतरीन विकल्प मिल जाएगा।

अभी तक डॉक्टरों के पास ऐसा कोई साधन नहीं है, जिसके जरिये चोट जल्द ठीक हो सके। अध्ययन के सह-लेखक डॉ. विल्सन जेक का कहना है कि सर्जरी के दौरान विद्युत-उत्तेजना से मदद मिलती है, लेकिन एक बार सर्जरी पूरी होने के बाद चिकित्सकीय हस्तक्षेप के दरवाज़े बंद हो जाते हैं, लेकिन इस उपकरण के माध्यम से हमने दिखा दिया कि निर्धारित समय में विद्युत-उत्तेजना देने से नसों की रिकवरी को बढ़ावा मिलता है।

यह उपकरण चिकित्सा विज्ञान का एक चमत्कार है। मनुष्य पर इसका प्रयोग होने के बाद आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में बड़ा बदलाव सामने आएगा। एक समय में जब लोगों के पास ऑपरेशन के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था, तब इस यंत्र को किसी वरदान से कम नहीं माना जा सकता। ऑपरेशन के बाद सबसे ज्यादा दिक्कत अंदरूनी जख्मों को भरने में रहती है। मरीज़ केवल दवाओं पर निर्भर रहता है। यह यंत्र मरीज़ों के ज़रूरतों को पूरा करेगा। अभी इसका परीक्षण मनुष्यों पर नहीं हुआ है, लेकिन शोधकर्ताओं का दावा है कि जब वे इंसान पर इसका प्रयोग करेंगे तो उन्हें निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी।

2018 में हुए कुछ नए शोध

रोबोट करेगा कैंसर का इलाज़

ह्यूस्टन में टेक्सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने भी एक खास आविष्कार किया है। वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे छोटा मेडिकल रोबोट बनाया है, जो सिर्फ 120 नैनोमीटर का है। वैज्ञानिकों का दावा है कि छोटे से रोबोट की मदद से आने वाले समय में कैंसर और अल्जाइमर के मरीज़ों का उपचार किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि रोबोट की मदद से  कीमोथैरेपी के दौरान कैंसर की सेल्स को आसानी से पहचाना जाएगा।

डिमेंशिया पर शोध

बुजुर्गों में याद्दाश्त खोने की बीमारी यानी डिमेंशिया पर ऑल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर ने एक शोध किया, जिसे मील का पत्थर कहा जा रहा है। शोध में यह सामने आया कि ग्लूटाथॉयोन की कमी डिमेंशिया के लिए जिम्मेदार है।

ग्रास नली विकसित करने में सफलता

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके मानव ग्रास नली के एक लघु कार्यात्मक संस्करण को विकसित करने में सफलता हासिल की है। अमरीका में सिनसिनाटी चिल्ड्रन सेंटर फॉर स्टेम सेल और ऑर्गेनाइज्ड मेडिसिन में शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस प्रयोग से व्यक्तिगत परेशानियों से राहत मिल सकती है।

कैंसर के उपचार में नई खोज

स्वीडिश शोधकर्ताओं के एक रिसर्च के अनुसार, मानव शरीर में बनने वाले सूक्ष्म अणु, जो विशेष रूप से मानव शरीर में सेलेनियम युक्त एंजाइम को रोकते हैं, वह कैंसर से लड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बन सकता है। शोधकर्ताओं ने यह तथ्य भिन्न प्रकार के कैंसर सेल्स पर वेधशाला में अणुओं के साथ किए गए प्रयोग के बाद जारी किए। अब दुनिया में नई-नई अनोखी चिकित्सा पद्धति और शोध आकार ले रही है। इससे मानवता का भला ही होगा।

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