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‘रोशन’ ने की थी संगीत की दुनिया रोशन

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खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते  संगीतकार रोशन का यह गीत उन पर ही पूरी तरह लागू होता है| आज भी अपने गीतों के माध्यम से रोशन संगीतप्रेमियों और उनके प्रशंसकों के खयालों में आते हैं | नई पीढ़ी रोशन साहब को ऋतिक रोशन के दादा के तौर पर जान सकती है| राकेश और राजेश रोशन के पिता के तौर पर जान सकती है, लेकिन हर संगीत प्रेमी जानता है कि रोशन ने कैसे संगीत की दुनिया रोशन की थी| संगीतकार रोशन का आज जन्मदिन है| इस अवसर पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी अनसुनी बातें |

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रोशनजी का जन्म गुजरांवाला में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है| 14 जुलाई 1917 को वो पैदा हुए थे| पूरा नाम था रोशन लाल नागरथ| छोटी उम्र से ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था| पहले गुरु थे मनहर बर्वे| गुरु के साथ वो भारत घूमे| लखनऊ के मौरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक में संगीत सीखा| अब यह भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है|

उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब उनके गुरु थे| बाबा अलाउद्दीन खां की सख्ती के तो किस्से भरे पड़े हैं| एक बार उन्होंने रोशन को जलती लकड़ी से मारा था| बाबा ने रोशन से तीन साल राग यमन का अभ्यास कराया| नतीजा देखिए, रोशन साहब के तमाम गाने राग यमन पर आधारित हैं|

उन्होंने सारंगी सम्राट कहे जाने वाले बुंदू खां से सारंगी सीखी| रोशन साहब के गानों में सारंगी का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है| 40 के दशक की शुरुआत में वो आकाशवाणी से जुड़े और करीब दस साल उससे जुड़े रहे| तमाम रेडियो कार्यक्रमों के लिए उन्होंने संगीत तैयार किया| 1948 में वो बंबई आ गए| संगीतकार ही बनना चाहते थे| यहां वो ख्वाजा खुर्शीद अनवर के सहायक बन गए, जो फिल्म सिंगार में संगीत दे रहे थे|

रोशन ने करियर के शुरुआती दौर में काफी संघर्ष किया| इन दिनों में वो केदार शर्मा से मिले, जो ‘नेकी और बदी’ नाम से फिल्म बना रहे थे| इसके संगीतकार थे स्नेहल भटकर| केदार साहब को रोशन ने बड़ा प्रभावित किया| केदार शर्मा ने स्नेहलजी से बात की और कहा कि मैं रोशन को लेना चाहता हूं| फिर रोशन ने इस फिल्म का संगीत दिया| दुर्भाग्य से फिल्म नहीं चली| इसके बावजूद केदार शर्मा ने उन्हें फिल्म दी ‘बावरे नैन’ दी| इस फिल्म के गाने “खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते” और “सुन बैरी बलम सच बोल रे” बेहद लोकप्रिय हुए|

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जीवनसाथी

रोशन साहब की पत्नी इरा मोइत्रा भी बहुत अच्छी बंगाली गायिका थीं और आकाशवाणी के लिए काम करती थीं| रोशन भी आकाशवाणी से जुड़े थे| यहीं दोनों की मुलाकात हुई और दोनों ने साथ जीवन जीने का फैसला किया|

शम्मी कपूर के जबरदस्त प्रशंसक

रोशन साहब की दो खासियत ऐसी थीं, जो उनके करीबियों को हमेशा याद रहती हैं| पहली, वे शम्मी कपूर के बहुत बड़े फैन थे| इस कदर कि उन्होंने शम्मी कपूर की फिल्म जंगली 28 बार देखी थी| उसी टेलर से, वैसे ही कपड़े सिलाते थे जैसे शम्मी कपूर के थे| दूसरी खासियत उनके अनुशासन प्रेम से जुड़ी है| उनके घर में डिनर का टाइम पक्का था| ठीक रात नौ बजे| अगर कोई पांच मिनट देर से पहुंचता तो उसे डिनर टेबल पर बैठने की इजाज़त नहीं दी जाती थी|

राग यमन उन्हें बहुत पसंद था| उनके तमाम गाने इस राग पर आधारित हैं| बांसुरी और सारंगी का उन्होंने बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया| 60 के दशक में उन्होंने तमाम हिट फिल्में दीं| उन्हें दिल की बीमारी थी| करीब 20 साल वो इस बीमारी के साथ जिए, लेकिन 16 नवंबर 1967 को पड़ा दिल का दौरा वो नहीं झेल पाए| उनका निधन हो गया| उनके बेटे राजेश रोशन संगीतकार के तौर पर उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं|

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