धर्म की शरण में जा रहे कम्युनिस्ट…

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चरम वामपंथी यानि कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वाले लोग किसी भी धर्म या ईश्वर में विश्वास नहीं रखते हैं, वे भगवान, अल्लाह, जीसस या इस तरह के किसी भी धर्म को निरर्थक मानते हैं| धर्म के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा में कोई स्थान नहीं है| किसी भी तरह के धार्मिक आयोजनों से ये लोग दूर रहते हैं और धर्म को नशे की तरह बुरा मानते हैं चाहे हिन्दू धर्म हो या ईसाई या इस्लाम धर्म| यूनाइटेड किंगडम के दो बार प्रधानमंत्री रहे कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक बेंजामिन डिज़राइली का कथन है कि “जहां ज्ञान ख़त्म होता है, वहां धर्म शुरू होता है” |

धर्म के धुर विरोधी माने जाने वाले इसी कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वाले लोग बदले राजनीतिक माहौल में अब मंदिरों में भगवान की शरण में पहुंचने लगे हैं| गौरतलब है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी की इन दिनों दो तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं| एक तस्वीर में येचुरी सिर पर कलश उठाए हुए तो दूसरी में सिर पर फूल रखे दिख रहे हैं| इस तस्वीर के वायरल होने का सबसे बड़ा कारण यही है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग नास्तिक होते हैं| वामदलों के सदस्यों के लिए पार्टी की ओर से सख्त हिदायत है कि वे किसी भी धार्मिक कार्यों या मंदिर के पूजा आदि में शामिल न हो, जबकि येचुरी तो पार्टी प्रमुख हैं|

अब सवाल यह उठता है कि जब ये लोग धर्म-कर्म को मानते ही नहीं हैं तो फिर यह ढोंग क्यों ? सत्ता पाने के लिए और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए ये भगवान को धोखा दे रहे हैं या वाकई में इन्होंने अपनी विचारधारा को त्याग दिया है| क्या कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग भगवान को मानने लगे हैं ? ख़बरों के अनुसार, मलयालम कैलेंडर के अंतिम महीने करकीडक्कम को रामायण मास के रूप में मनाया जाता है| इस वर्ष यह आयोजन 17 जुलाई से 16 अगस्त तक किया जाएगा| इस दौरान राज्य सरकार के साथ ही सीपीएम पार्टी स्तर पर कई कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है| इससे पहले भी श्रीकृष्ण जयंती पर सीपीएम ने राज्य में रैलियों का संचालन किया था|

इतने वर्षों के धर्म के विरोध के बाद अब कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग यह जान गए हैं कि यदि जनता यानी मतदाताओं को अपने पक्ष में करना है तो धर्म की ओर मुड़ना ही होगा| वे जान गए हैं कि धर्म जनता की आस्था से जुड़ा होता है, वह दिल से भगवान से जुड़ी होती है| उन्होंने आरएसएस और भाजपा का उत्थान देखा है| विभिन्न धार्मिक आयोजन कर इन्होंने जनता के दिल में पैठ जमा ली है|

लोग मानते हैं कि कम्युनिस्ट धर्म विरोधी, पाश्चात्य संस्कृति को मानने वाले और नास्तिक होते हैं| सीपीएम अब धार्मिक आयोजन कर अपनी इसी परंपरागत धर्म विरोधी छवि को तोड़ने की कोशिश कर रही है| वोट के लिए अब ये नास्तिक लोग भी धर्म की शरण में पहुंचने लगे हैं।

जब त्रिपुरा में चुनाव होने वाले थे, तब भाजपा के रणनीतिकारों ने देखा कि यहां धर्म को ना मानने वाले कम्युनिस्टों का काफी दिनों से राज है| तब उन्होंने वहां की धार्मिक व आध्यात्मिक संस्थाओं, एनजीओ और संघ व भाजपा का समर्थन करने वाली संस्थाओं को जोड़ा और पूर्वोत्तर में सुनियोजित ढंग से काम करना शुरू कर दिया। कम्युनिस्ट पार्टी ने इस पर ध्यान नहीं दिया| इसी कारण 25 साल राज करने और बेहतर मत प्रतिशत हासिल करने के बावजूद माकपा त्रिपुरा में सत्ता से बाहर हो गई। वह नहीं जान पाई कि भारत में धर्म और जाति सबसे बढ़कर है, इसी के बल पर पार्टियां यहां राज करती आ रही हैं| कम्युनिस्टों ने वर्ग संघर्ष के आगे वर्ण, जाति और धर्म की हकीकत को नजरअंदाज़ किया है। परंतु अब कम्युनिस्ट जाग्रत हो चुके हैं, अब उन्हें होश आने लगा है|

-अंकुर उपाध्याय

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