Peshwa Bajirao Death Anniversary 2019 : अजेय और अपराजित योद्धा बाजीराव  

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बाजीराव पेशवा (Peshwa Bajirao Death Anniversary 2019), जिनका नाम सुनते ही भुजाएं फड़क उठती हैं| मानो वीरता और देशभक्ति का हमारे भीतर संचार होने लगता है| वे मराठा साम्राज्य के सबसे महान पेशवा थे। पेशवा बाजीराव अपने जीवन में कभी कोई युद्ध नहीं हारे| ऐसे अजेय और अपराजित योद्धा की आज पुण्यतिथि है|

इस ख़ास अवसर पर हम आपको उनके जीवन के विभिन्न घटनाक्रमों से अवगत करवाएँगे (Peshwa Bajirao Death Anniversary 2019) :

पेशवा का अर्थ होता है प्रधानमंत्री। बाजीराव मराठा शासक छत्रपति शाहूजी के चौथे पेशवा यानी प्रधानमंत्री थे। पेशवा बाजीराव का जन्म 18 अगस्त सन 1700 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले की श्रीवर्धन तहसील में एक भट्ट परिवार में हुआ था| उनके पिता का नाम बालाजी विश्वनाथ और माता का नाम राधाबाई था| उनके पिताजी छत्रपति शाहू के प्रथम पेशवा थे।

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सन 1720 में उनके पिता विश्वनाथ की मृत्यु के बाद बाजीराव को 20 साल की आयु में पेशवा के पद पर नियुक्त किया गया। बाजीराव ने “हिन्दू पद पादशाही” का प्रचार एक आदर्श बन कर किया। उत्तर में मराठा साम्राज्य को बढ़ाने में बाजीराव का सबसे मुख्य योगदान रहा| बाजीराव के पेशवा पद पर आते ही छत्रपति शाहू नाममात्र के ही शासक बन गए और खासकर सतारा स्थित उनके आवास तक ही सीमित रह गए। मराठा साम्राज्य उनके नाम पर तो चल रहा था, पर  असली ताकत पेशवा बाजीराव के हाथ में थी। बाजीराव घुड़सवारी करते हुए लड़ने में सबसे माहिर थे और यह माना जाता है उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक भारत में आज तक देखा नहीं गया।

निज़ाम को सुधारा

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निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम,  मुग़ल साम्राज्य का वाइसराय था। उसने डेक्कन में नया राज्य निर्माण किया और मराठों को कर वसूली के अधिकार के लिए चुनौती दी। पेशवा बाजीराव 4 जनवरी, 1721 में निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम से मिले और अपने विवादों को एक समझौते के तौर पर सुलझाया, पर तब भी निज़ाम नहीं माना और मराठों के अधिकार के खिलाफ डेक्कन से कर वसूलने लगा। 28 फरवरी, 1728 में बाजीराव और निज़ाम की सेना के बीच एक युद्ध हुआ जिसे ‘पल्खेद की लड़ाई’ कहां जाता है। इस लड़ाई में निज़ाम की हार हुई उस पर मजबूरन शांति बनाये रखने के लिए दवाब डाला गया। उसके बाद से वह सुधर गया।

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बाजीराव ने सन 1723 में दक्षिण मालवा की ओर अभियान शुरू किया। मराठा राज्य के प्रमुख रानोजी शिंदे, मल्हारराव होलकर, उदाजीराव पवार, तुकोजीराव पवार और जीवाजीराव पवार ने सफलतापूर्वक चौथ एकत्र किया। अक्टूबर 1728 में बाजीराव ने एक विशाल सेना अपने छोटे भाई चिमनाजी अप्पा के नेतृत्व में भेजी, जिसके कुछ प्रमुख थे शिंदे, होलकर और पवार। 29 नवम्बर 1728 को चिमनाजी की सेना ने मुग़लों को अमझेरा में हरा दिया।

बुंदेलखंड का अभियान

बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल ने मुग़लों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया था। इस कारण दिसम्बर 1728 में मुग़लों ने मुहम्मद खान बंगश के नेतृत्व में बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया और महाराजा के परिवार के लोगों को बंधक बना दिया। छत्रसाल राजा के बार-बार बाजीराव से मदद माँगने पर मार्च, सन 1729 को पेशवा बाजीराव ने उत्तर दिया और अपनी ताकत से महाराजा छत्रसाल को उनका सम्मान वापस दिलाया। महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव को बहुत बड़ा जागीर सौंपा और अपनी बेटी मस्तानी और बाजीराव का विवाह भी करवाया।

बाजीराव पेशवा की पहली पत्नी का नाम काशीबाई था, जिसके 3 पुत्र थे| वहीं उनकी दूसरी पत्नी का नाम मस्तानी था, जो छत्रसाल के राजा की बेटी थी। बाजीराव उनसे बहुत अधिक प्रेम करते थे और उनके लिए पुणे के पास एक महल भी बाजीराव ने बनवाया, जिसका नाम उन्होंने मस्तानी महल रखा। सन 1734 में बाजीराव और मस्तानी का एक पुत्र हुआ जिसका नाम कृष्णा राव रखा गया था।

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28 अप्रैल 1740 को अचानक उनकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु का कारण बुखार या हृदयाघात था। उस समय बाजीराव एक लाख की विशाल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे और उनका पड़ाव वर्तमान मध्यप्रदेश में इंदौर के पास खरगोन जिले में था। 28 अप्रैल 1740 को ही नर्मदा के किनारे रावेरखेड़ी नामक स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी समाधि आज भी यहाँ मौजूद है।

पेशवा बाजीराव प्रथम निसंदेह भारतीय इतिहास के महान नायकों में से एक थे। किन्तु दुःख की बात है कि आज भी इनके बारे में हम बहुत कम ही जानते हैं।

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