बंकिम दा की जयंती आज

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वंदे मातरम्
सुजलां सुफलाम्, मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम् मातरम्…

यह गीत सुनते ही हमारा रोम-रोम देशभक्ति से ओतप्रोत हो उठता है| स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने और ब्रिटिश राज के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंकने में इस गीत का महत्वपूर्ण योगदान रहा| आज हमारे  इस राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की जयंती है| उन्होंने देश को कई गीत और रचनाओं की सौगात दी| उनकी साहित्यिक रचनाओं के लिए उन्हें युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा|

बंगला भाषा के प्रसिद्ध लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 27 जून 1838 ई. को बंगाल के चौबीस परगना ज़िले के कांठलपाड़ा नामक गांव में एक संपन्न परिवार में हुआ था| उनकी लेखनी से बंगला साहित्य समृद्ध हुआ| उन्होंने कई ऐतिहासिक उपन्यास लिखे| उन्हें भारत का एलेक्जेंडर ड्यूमा माना जाता है|

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1865 में अपना पहला उपन्यास ‘दुर्गेशनंदिनी’ लिखा था| इन्होंने अपनी पढ़ाई और शिक्षा कोलकाता के हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज से की थी| बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यासों के माध्यम से देशवासियों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह की चेतना का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी|

27 वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘दुर्गेशनंदिनी’ नाम का उपन्यास लिखा| इस ऐतिहासिक उपन्यास से ही साहित्य में उनकी धाक जम गई| फिर उन्होंने ‘बंग दर्शन’ नामक साहित्यिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया| राष्‍ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’  के रचयिता का नाम इतिहास में युगों-युगों तक अमर रहेगा क्योंकि यह गीत उनकी एक ऐसी कृति है, जो आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय को आन्दोलित करने की क्षमता रखती है| इस गीत को सबसे पहले 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था|

एक महान राष्‍ट्रभक्‍त के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले और लोगों के मन में देशभक्ति की लौ जगाने वाले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 8 अप्रैल, 1894 को दुनिया को अलविदा कह दिया था| उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन|

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