सेनेटरी नैपकिन के प्रयोग के लिए जागरूकता ज़रूरी

0

पिछले दिनों दिल्ली के विज्ञान भवन में जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक का आयोजन किया गया| बैठक में इस मानसून के मौसम में आम उपभोक्ताओं के लिए सौगातों की झड़ी लग गई| विशेषकर महिलाओं और युवतियों के लिए यह बैठक राहत भरा समाचार लेकर आई है| इसमें महिलाओं द्वारा प्रयोग किए जाने वाले सेनेटरी नैपकिन को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से मुक्त कर दिया गया है। महिलाओं की सेनेटरी नैपकिन को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने की लंबे समय से आलोचना हो रही थी| सेनेटरी नैपकिन अब तक 12 प्रतिशत के स्लैब में शामिल था| इस निर्णय को लेकर कई महिला संगठनों ने नाराज़गी जाहिर की थी|

निश्चित ही यह नियम सराहनीय है परंतु इस सौगात का फायदा कुछ प्रतिशत महिलाएं ही उठा पाती हैं| फेडरेशन ऑफ़ ऑब्स्ट्रेटक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ इंडिया के अनुसार, देश की 18 प्रतिशत लड़कियां और महिलाएं हीं सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग करती हैं, शेष 82 प्रतिशत महिलाएं आज भी पुराना कपड़ा, राख और घास जैसे गंदे और असुरक्षित विकल्प अपनाती हैं| इस अध्ययन से यह तथ्य भी निकलकर सामने आया कि देश में लगभग 68 फीसदी महिलाएं बाजार से सेनेटरी नैपकिन खरीदने के पैसा नहीं दे सकतीं हैं।

देश के दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं आज भी माहवारी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात करने से कतराती हैं| साथ ही उनमें सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग किए जाने को लेकर जागरुकता की भी कमी है| दुकान पर जाकर सेनेटरी नैपकिन मांगने में उन्हें झिझक महसूस होती है| इसी कारण वे पुराने कपड़े जैसे परंपरागत और असुरक्षित विकल्पों तक ही सीमित रह जाती हैं| इस झिझक और जागरूकता की कमी के कारण ही महिलाएं कई बार संक्रमण की शिकार हो जाती हैं|

जब लड़की किशोरावस्था की दहलीज़ पर कदम रखती है तो उसके शरीर में बदलाव होने शुरू हो जाते हैं| इन्हीं बदलावों में से एक माहवारी भी है| मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता की कमी कई बीमारियों को न्यौता देती है| इस दौरान होने वाले रक्तस्त्राव को रोकने में सेनेटरी नैपकिन काफी मददगार साबित होता है और यह स्वास्थ्यकर भी होता है|

ग्वालियर के सिंधिया कन्या विद्यालय में सेनेटरी नैपकिन बनाने की आठ मशीनें लगी हैं। वहां के विद्यार्थी इन मशीनों के माध्यम से 2012 से सेनेटरी नैपकिन बना रहे हैं| एक पैड की कीमत मात्र एक रुपए 26 पैसे है। ये विद्यार्थी इन्हें आसपास के गांवों में बांट रहे हैं। इन गांवों में भी मशीन लगाई गई हैं, जिससे महिलाओं को कम कीमत में पैड्स मिल सकें। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और स्कूलों में लड़कियों तक सस्ते सैनेटरी नैपकिन पहुंचाने के लिए सरकारों को इसी तरह के विशेष कदम उठाने चाहिए| इसके लिए देश के सभी प्रदेशों की हर तहसील में सेनेटरी नैपकिन की मशीन लगाई जानी चाहिए| इससे बिना किसी झिझक के महिलाएं आसानी से मशीन के माध्यम से सेनेटरी नैपकिन प्राप्त कर सकेंगी| मशीन से सेनेटरी नैपकिन किस तरह प्राप्त किया जाए, इसकी जानकारी देने के लिए एक महिला कर्मचारी की नियुक्ति की जा सकती है| साथ ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और आशा कार्यकर्ताओं को भी सैनेटरी नैपकीन उपलब्ध करवाया जा सकता है| इससे महिलाएं उनसे सैनेटरी नैपकीन खरीदने में संकोच नहीं करेंगी और इनकी पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों तक हो सकेगी| देश के कुछ स्थानों पर इस प्रकार की मशीनें लगी हैं, परन्तु इन्हें वृहद् स्तर तक पहुंचाने की आवश्यकता है| इससे महिलाएं स्वच्छ और बीमारियों से मुक्त रह सकेंगी|

-अंकुर उपाध्याय

Share.