क्या आत्महत्या प्रतिरोध का हथियार बन रहा है?

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आज कल समाचार-पत्रों में दो ही तरह की घटनाएं सुर्ख़ियों में रहती हैं, पहली बलात्कार की और दूसरी आत्महत्या की| बुराड़ी, हज़ारीबाग, झारखण्ड में हुई सामूहिक आत्महत्याएं और दूसरी तरफ बिहार के मुज़फ्फरपुर के बालिका गृह में 29 नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना| ऐसा लगता है मानो इन दोनों तरह की घटनाओं के बिना कोई समाचार-पत्र छपता ही नहीं है|

डार्विन के ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (survival of the fitest) सिद्धांत के अनुसार, केवल शक्तिशाली प्राणी/व्यक्ति ही जीवित या सफल होते हैं बाकी मर जाते हैं या असफल होते हैं| यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था| यह तर्क दिया जा सकता है कि वही व्यक्ति जीवित रह सकता है, जो जीवन के संघर्षों, समस्याओं या चुनौतियों का निडरता व साहस से सामना करता है| जीवन के संघर्षों का सामना अकेले नहीं सामूहिकता के साथ सरलता से किया जा सकता है| सामूहिकता में वह ताकत होती है, जो जटिल से जटिल कार्य को भी सरलतम कर देती है तो फिर आज के दौर में ऐसा क्यों नहीं हो रहा? क्यों लोग परेशानी का सामना करने की बजाय उनसे भागने लगे हैं? व्यक्तिगत आत्महत्याओं का ग्राफ तो तेजी से बढ़ ही रहा है परन्तु पूरे के पूरे परिवार के सामूहिक आत्महत्या कर लेने के आंकड़ों में भी वृद्धि देखी जा सकती है|

परिवार या सामूहिकता को तो तनाव दूर करने, भावनात्मक संबल, और हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने का माध्यम माना जाता था, फिर आज यह कैसे परिवार उभर रहे हैं, जो यथार्थ का सामना करने के बजाय मौत को गले लगाना ज्यादा सरल मानते हैं| ऐसा कैसे संभव है कि परिवार/समूह के सभी सदस्यों की सोच नकारात्मक होने लगी है? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है कि परिवार का हर सदस्य, फिर चाहे वह किसी भी उम्र का क्यों न हो, एक ही जैसे निर्णय कैसे लेने लगे हैं क्योंकि जब परिवार में कोई एक या अन्य सदस्य हिम्मत हारता था या निराश होता था तो बाकी के सदस्य उसे हिम्मत देते और साथ खड़े रहने का सांत्वना देते थे कि हर परेशानी का हल निकाला जा सकता है|

समस्या को चुनौती के रूप में लेना चाहिए और उसका मुकाबला डटकर करना चाहिए| कहते हैं न कि मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जिसके पास सबसे विकसित मस्तिष्क है तो फिर इसी मस्तिष्क का प्रयोग करके हर समस्या का समाधान क्यों नहीं निकाला जा सकता है| क्यों हम हर समस्या का हल धर्म, जादू-टोना या अन्धविश्वास द्वारा निकालने की कोशिश करते हैं? यह जानते हुए भी कि मनुष्य अपनी मदद खुद कर सकता है|

एक माह में सामूहिक आत्महत्या की तीन घटनाएं सामने आईं, जो सारे समाज के लिए एक गहन चिंता का विषय है| हमारे समाज में बढती असहनशीलता हमे एक ‘जोखिम समाज’ (रिस्क सोसाइटी) की ओर ले जा रही है जहां परिवार, विवाह प्रणाली, नातेदारी, विश्वास व्यवस्था और यहां तक की मानव जीवन भी खतरे में है| संघर्ष करना/मुकाबला करना तो जैसे जीवन से गायब ही हो चुका है| जीन बीचलर के अनुसार, आत्महत्या की व्याख्या वाह्य कारकों की अपेक्षा व्यक्तिगत कारकों के आधार पर ही की जा सकती है|

बीचलर ने चार विभिन्न प्रकार की आत्महत्याओं की चर्चा की- 1. पलायनवादी आत्महत्या (किसी असहनीय स्थिति से भागना), 2. आक्रामक आत्महत्या (दूसरों को नुकसान पहुँचाने या उन्हें अपराध बोध कराने के लिए), 3. बलिदान (दूसरों को लाभ पहुँचाने या उनका जीवन बचाने के लिए आत्महत्या), 4. खेल-खेल में आत्महत्या  (जानबूझकर जोख़िम मोल लेना जिसका परिणाम मृत्यु हो सकता है)| उन्होंने केस स्टडी मेथड और उपलब्ध साहित्य के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि आत्महत्या किसी समस्या का प्रत्युत्तर भी है और किसी समस्या के समाधान का एक तरीका भी| उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि कुल आत्महत्याओं में से 75% पलायनवादी आत्महत्याओं की श्रेणी में आती है क्योंकि उनके लिए आत्महत्या समस्या समाधान का एक तरीका है|

इसी तरह समाजशास्त्री दुर्खीम का मत है कि आधुनिकता ने तार्किकीकरण एवं नियमहीनता के अनेक पक्षों को उत्पन्न किया है जिसके कारण सामाजिक इकाई सामूहिकता के नियंत्रण से अथवा निर्देशन से पृथक हो जाती है| नियंत्रणकारी शक्तियां और नैतिक आवश्यकताओं के सवाल सामाजिक इकाई के जीवन से पृथक हो जाते हैं और वह केवल आर्थिक लक्ष्य एवं स्व के विकास में संलग्न हो जाता है| आधुनिकता से उत्पन्न हुई मांग सामाजिक इकाई को अनैतिक प्रतियोगिताओं का हिस्सा बना देती है और यह स्थिति उस इकाई को मनोभावनात्मक दृष्टि से लगभग खोखला करती जाती है, उसमें अविश्वसनीयता उत्पन्न होती है और इस कारण उत्पन्न होने वाला आकस्मिक लाभ अथवा आकस्मिक नुकसान सामाजिक इकाई की सहनशीलता की सीमा से बाहर हो जाता है और यह स्थिति उस इकाई को आत्महत्या के लिए प्रेरित या बाध्य करती है|

प्रतियोगी अर्थव्यवस्था ने दो तरह के समूहों को उत्पन्न किया है एक जो यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी तरह की प्रतियोगिता में उसकी जीत सुनिश्चित है क्योंकि उसके लिए जीत एक उपभोक्ता वस्तु है जो खरीदी जा सकती है| दूसरा वह समूह है जो सुनिश्चित करता है कि किसी भी प्रतियोगिता में वह हारेगा क्योंकि उपभोक्ता वस्तु के रूप में जीत उसकी खरीद के बाहर है| आत्महत्या दोनों ही समूहों में विद्यमान है एक जो सफलता की दौड़ में आगे बढ़ता जाता है पर अचानक ब्रेक लगता है क्योंकि अधिक शक्तिशाली ‘जीत’ को खरीद लेता है| दूसरा जो असफलता को भाग्य मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं और ईश्वरीय इच्छा के तर्क को सामने लाते हैं| असल में राज्य एवं समाज की तुलना में धर्म का तर्क व्यक्ति को निराशावादी नहीं बनाता अपितु भाग्यवादी बनाता है जिसमें आत्महत्या करना भी ईश्वरीय निर्देश है| सामूहिक आत्महत्या को इस दृष्टि से समझने की जरुरत है| इन दोनों ही समूहों के पीछे का एक भयावह सच है|

जन संघर्षों एवं जनआंदोलनों से इन समूहों को अलग करने की कोशिशें सफल हो रही हैं क्योंकि ‘क्यों’, ‘कैसे’, ‘कब’, ‘कहां’ इत्यादि सवाल संघर्षों व आंदोलनों के कारण सामूहिक रूप लेते हैं और ‘सामूहिक ‘ अपने आप  में एक मूल्य बन कर ‘जन-शक्ति’ की रचना करता है| ऐसे संघर्ष व आन्दोलन पारस्परिक समन्वय व सहयोग को सम्मिलित कर व्यक्ति को सफलता व जीत के प्रति कहीं न कहीं आशावान बनाते हैं| यही आशा आत्महत्याओं के विरुद्ध संस्कृति को महत्त्वपूर्ण स्थान देती है| असल में राज्य आत्महत्या को ‘स्व के विरुद्ध हिंसा’ का रूप देकर अपने दायित्वों से जनता को परिचित न कराने की कोशिश करता है|

अंध-आस्था का तंत्र (बुराड़ी, दिल्ली), आर्थिक तंगी, कर्ज, तनाव, बदनामी, बीमारी (हजारीबाग एवं रांची) जुलाई 2014 में 24 लोगों द्वारा की गयी (11+6+7) सामूहिक (समूचा परिवार) आत्महत्याओं के कारण बनते हैं| आत्महत्याओं के पूर्व ‘सुसाइड नोट’ का लिखा जाना यह सिद्ध करता है कि यह आत्महत्याएं चेतनाशील स्थितियों का परिणाम हैं क्योंकि कारणों को उल्लेख पत्रों में किया गया है|अब सवाल यह है कि वे कौन सी स्थितियां हैं जो आत्महत्या को उकसा रहीं हैं और इन स्थितियों को उत्पन्न करने वाली प्रणालियाँ/उप-प्रणालियाँ/ताकतें कौन सी हैं?

वैश्वीकरण के इस दौर में गतिशीलताएं इतनी तीव्र एवं व्यापक हुई हैं कि कोई भी संस्थागत ढांचा समाज में किसी भी प्रकार का अनुकूलन स्थापित करने में सक्षम नहीं है| क्या राज्य इन आत्महत्याओं के कारणों – गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, आर्थिक तंगी- को दूर करने में सक्षम नहीं है? ऐसी घटनाओं पर शिक्षकों अथवा अकादमिक बुद्धिजीवियों की चुप्पी भी बेहद खतरनाक है, और हमारे समक्ष अनेक प्रश्नों को उत्पन्न करती है?  यह एक तथ्य है कि हम सबके जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि हमें उससे बाहर निकलने का रास्ता नहीं सूझता या हमारे प्रयास असफल हो जाते हैं और हम निराशा हो जाते हैं| किसी ने कहा है कि निराश मत होना, कमजोर तेरा वक्त है, तू नहीं| इसीलिए जिन्दगी को ढ़ोना नहीं, जीना आना चाहिए तभी समाज को संकटों के दौर से बाहर निकला जा सकता है|

-डॉ. ज्योति सिडाना

(लेखिका समाजशास्त्र की सहायक प्राध्यापक हैं)

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