राहुल गांधी का गले लगाना, कितना सही…कितना गलत

1

मैं राजनीति में नहीं हूं, इसलिए राहुल गांधी से किसी भी तरह की सहमति या असहमति का प्रश्न ही नहीं उठता| लोकसभा में उनके भाषण के बाद, जिस तरह वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले मिलने प्रधानमंत्री के ही स्थान पर गए थे, उसके कुछ तकनीकी अर्थ भी हैं|

विश्वभर की स्थापित संसदीय परम्पराओं के अनुसार, इसे तकनीकी रूप से ‘क्रासिंग द फ्लोर’ भी कहा जा सकता है, जिसे दल-बदल समझा जाता है| तभी तो अध्यक्ष के सामने का स्थान, जो दोनों ही पक्षों के बीचों-बीच होता है, को ‘वेल’ (कुआं) कहा जाता है| इसे पार करना संसदीय नियमों, परम्पराओं, शिष्टाचार व व्यवहार के अनुसार निषिद्ध है|

संसदीय नियम और परम्पराएं, चलते हुए सदन में सदस्यों की भाषा तो ठीक है, भाव-भंगिमाओं (बॉडी-लैंगवेज) और सलीके (एटिकेट) पर भी बहुत स्पष्ट रूप से लिखित हैं| संभव है, राहुलजी से यह कार्य उत्साह या भोलेपन में हो गया हो , जिसके लिए वे क्षमा भी मांग सकते थे| पर चूंकि यह योजनाबद्ध था, इसीलिए उन्होंने अपनी सीट पर आकर, लाइव कवरेज के चलते, आंख मारकर देश और जनता से, जो कुछ भी कहना या करना चाहा, वह भी सलीके के विरूद्ध था|

दूसरा, नरेंद्र मोदी को ‘जेड-प्लस’की सुरक्षा मिली हुई है| नियमानुसार ऐसे व्यक्ति को बिना उनकी अनुमति या जानकारी के इस तरह गले नहीं लगाया जा सकता, या छुआ भी नहीं जा सकता|

बहुत ही नीचे जाकर, राहुलजी से पूर्वाग्रह रखने वाले लोग तो यहां तक कह सकते हैं, कि माना राहुलजी संसद के सदस्य होने के कारण, सुरक्षा व्यवस्था में ‘खाना-तलाशी’ या ‘जामा-तलाशी’ से मुक्त हैं, पर तकनीकी या वैधानिक रूप से तो वे ‘जमानत पर’ ही हैं न|
निश्चित रूप से उनका यह कार्य छवि की ‘होड़’ या ‘दौड़’ में आगे जाने का एक उपक्रम था| जो किसी योजना के तहत, और किसी छवि-निर्माण विशेषज्ञ की सलाह पर हुआ हो, पर था तो अनुचित| यूक्रेन की संसद में इसी तरह की एक दुर्घटना हो चुकी है|राहुलजी का यह कार्य संसदीय नियमों, परम्पराओं व सलीके के विरूद्ध तो था, साथ ही चार पीढ़ी की गौरवमयी संसदीय परम्पराओं के वाहक से तो ऐसा बिलकुल ही अपेक्षित नहीं था|

– कमलेश पारे, भोपाल

Share.