नाले ने उजागर कर दी सारी असलियत

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मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार को जनता की कितनी चिंता है, इसका उदाहरण उस वक्त सामने आ गया, जब भोपाल में छह वर्षीय बच्चा नाले के उफान में बह गया और 36 घंटे की तलाशी अभियान चलाने के बाद भी उसका कोई पता नहीं चल पाया।

सच तो यह है कि हर बरसात के पहले जनता के विभिन्न वर्गों द्वारा यह आवाज उठाई जाती है कि इलाके के नालों और नालियों की अच्छी तरह से सफाई हो, जिससे पानी कहीं नहीं ठहरे और जलभराव की स्थिति कहीं पैदा नहीं हो। बरसाती पानी  के न निकलने की वजह से कीचड़ और गंदगी के साथ बीमारियों की आशंका बनी रहती है और जब भोपाल का इतना विकास  नहीं हुआ था, तब नगर निगम और प्रशासन नियमित रूप से सफाई किया करते थे। एक समय तो नगर निगम का नाला गैंग भी हुआ करता था, जिसका मुख्य कार्य था कि वह शहर के नालों की अच्छी तरह सफाई करे। कम संसाधन होने के बावजूद भोपाल में बरसात में ऐसे हादसे नहीं हुआ करते थे, जैसे अब देश में सफाई पर दूसरे नंबर आने पर हो रहे हैं।

गत मंगलवार को भारी बारिश के कारण अन्य नालों के साथ भोपाल स्थित पंचशील नगर के नाले  में भी उफान आ गया और उसमें दो बच्चे बह गए। एक बच्चे को तो बच्चा लिया गया परंतु छह साल का डुग्गू पूरे दो दिन तक खोजबीन के बाद खोज पाए। पंचशील नगर से जाने वाले इस नाले का पानी शाहपुरा तालाब में जाता है और कुल दूरी मात्र डेढ़ किलोमीटर के करीब है। बच्चे का पता लगाने के लिए तीन एजेंसियों के 100 से अधिक जवान डेढ़ किलोमीटर में उसे तलाशते रहे, लेकिन उन्हें सिवा कचरे के और कुछ नहीं मिला। जिस कचरे की सफाई के लिए निरंतर आवाजें उठती रहती हैं, उससे नाला भरा हुआ था और बचाव वाले उसी कचरे को उलट-पुलट कर तलाशी में लगे रहे।

आखिर काफी तलाशी के बाद डुग्गू का शव एकांत पार्क से खोज निकाला गया,  पर 15 सालों में शिवराज सरकार ने कितना विकास किया है, इस दावे की पोल खोल कर रख दी। यह एक नाले की स्थिति है| यदि शहर के अन्य नालों का अवलोकन किया जाए तो मालूम पड़ेगा कि वहां भी हालात गंभीर हैं। नालों की सफाई का दायित्व नगर निगम का होता है परंतु शहर का जितना विकास हुआ है, उस हिसाब से लगता है कि नगर निगम के पास या तो पर्याप्त संसाधन नहीं है या उसमें इतना अमला नहीं है, जिससे वह शहर के लिए आवश्यक काम कर सके। भोपाल के संबंध में नगर निगम और अन्य सरकारी एजेंसियों के बीच कितना तालमेल है, इसका उदाहरण तो पिछले दिनों तब मिला, जब महापौर आलोक शर्मा कुर्सी लगाकर सड़क पर धरने पर बैठ गए थे।

आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रशासन में जिम्मेदारी निर्धारित करने का कोई सिलसिला अभी तक लागू नहीं हो पाया है। जैसे कि पंचशील नगर के बच्चे संबंधी हादसे के लिए जिम्मेदारी किस पर डाली जाएगी, इसको शायद कोई नहीं बता सकता।

नगर निगम और सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनके अभिभावकों की है, लेकिन जब कोई बच्चा अपने घर के आसपास हो और पानी उसे बहाकर ले जाए तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। बरसात में सड़कों से लेकर कॉलोनियों में भरने वाले पानी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। इस घटना का दुखद पहलू यह है कि बच्चे के पिता ने गोलियां खा ली और अब वह गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती हैं। किसी एक घटना पर लोगों का धैर्य टूट जाए और वे अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए सामने आ भी जाएं, लेकिन इससे समस्या का  समाधान नहीं होगा। समस्या का समाधान तभी संभव है, जब लोग जागरूक हों और प्रशासन को कार्य करने के लिए मजबूर करें। जब तक ऐसा नहीं होगा,ऐसे हादसे होते रहेंगे। आज एक  पिता ने अपना बच्चा खोया है, कल आपका भी हो सकता है|

– कुशाग्र वालुस्कर

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