मुस्लिम समाज को आगे आना होगा…

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आखिर फिर लोकसभा में तीन तलाक़ विधेयक को मंजूरी दे दी गई। विधेयक पारित होने के दौरान कांग्रेस, डीएमके और कई विपक्षी दलों ने सदन से वॉकआउट किया। विपक्षी पार्टियां तीन तलाक़ बोलने को संज्ञेय अपराध बनाने का विरोध करती चली आ रही हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक में सज़ा के प्रावधान को हटाया जाए| वह इसे प्रवर समिति को सौंपने की मांग कर रही है। लोकसभा ने इससे पहले भी तीन तलाक़ विधेयक को पारित किया था, परंतु लंबे समय तक राज्यसभा में विधेयक अटका रहा।

सरकार ने इस पर अध्यादेश जारी कर दिया। अब इसे एक बार फिर पारित करवाना ज़रूरी हो गया था, लेकिन विधेयक पर विपक्ष का जैसा रुख बना हुआ है, उसे देखते हुए नहीं लगता है कि राज्यसभा में यह विधेयक पारित होगा। हालांकि नए विधेयक में कुछ संशोधन किए गए हैं, लेकिन विपक्ष संतुष्ट नहीं है। सरकारी पक्षों का कहना है कि इससे मुस्लिम महिलाओं का सशक्तीकरण होगा। भारतीय संविधान में मुस्लिम समाज में उनके धार्मिक कानून शरीयत के अनुसार, घरेलू मामले हल करने की इजाज़त दी गई है। इसमें सम्पत्ति की विरासत आदि मुख्य मामले होते हैं। शरीयत में महिलाओं के जो अधिकार हैं, वे उन्हें पाने की हकदार हैं। निकाह और तीन तलाक़ के मामले भी इसी अधिकार के तहत आते हैं। तीन तलाक़ के मामले में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं।

तीन तलाक़ संबंधी नए विधेयक पर लोकसभा में जमकर बहस ज़रूर हुई, लेकिन उसका सामाजिक बदलाव पर ज़ोर देखने को मिला। सामाजिक बदलाव के अधिकार के तहत ही सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को गैर संवैधानिक करार दिया था। साथ ही फैसला सुनाने वाली पीठ के एक न्यायमूर्ति ने राय दी थी कि तीन तलाक़ का मामला शरीयत से जुड़ा है। इस पर संसद को शरीयत के दायरे को ध्यान में रखकर कानून बनाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है।

आखिर सरकार कानून बनाने की कवायद कर रही है। राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं है और विपक्ष विधेयक के सज़ा संबंधी प्रावधान से संतुष्ट नहीं है। सज़ा संबंधी प्रावधान को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। सरकार को इस प्रावधान पर विचार करना चाहिए। जहां तक तीन तलाक़ की रूढ़ी परम्परा को खत्म करने का सवाल है। इसकी सफलता के लिए मुस्लिम पुरुष नेतृत्व ही रास्ता निकाल सकता है। कई मुस्लिम देश हैं, जहां तीन तलाक़ की प्रथा बंद कर दी गई है। भारत के मुस्लिम समुदाय को भी इस पर गौर करना चाहिए। आखिर मुस्लिम महिलाएं न्याय की पूरी हकदार हैं। कोई पुरुष तीन बार तलाक़ बोलकर निकाह जैसे बंधन को कैसे तोड़ सकता है। सरकार कानून बनाने की कवायद कर रही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक़ को असंवैधानिक करार दे चुकी है। ऐसे में मुस्लिम समाज को नई सोच के साथ आगे आना चाहिए।

 

– कुशाग्र वालुस्कर

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