ग्रीन हाउस गैसों से बड़ा खतरा…

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हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट से पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के तहत जलवायु संबंधित संस्था अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन ने ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन नाम से वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान समय में पृथ्वी के वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। रिपोर्ट में विश्व के विभिन्न देशों के द्वारा ग्रीनहाउस गैसों को लेकर उठाए गए कदमों, आवश्यकताओं, कमजोरियों और आंकड़ों को शामिल किया है। रिपोर्ट में जिक्र है कि वर्तमान में कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का स्तर पूर्व औद्योगिक स्तर से काफी अधिक है। इसमें कमी होने ही कोई संभावना नज़र नहीं आती।

रिपोर्ट पर नज़र डालने पर आंकड़े सामने आते हैं कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 2015 से 2016 की तुलना में 2017 में अधिक हुई। जहां 2015 में कार्बन डाइ ऑक्साइड का वायुमंडल स्तर 400.1 पीपीएम था वहीं 2016 में वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड का स्तर 403.3 पीपीएम था, जबकि 2017 में 405.5 पीपीएम रहा, जो वैश्विक औसत पर पहुंच गया। यह औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में ढाई गुना अधिक है।

इसी तरह मिथेन गैस की साल 2017 में वायुमंडल में मात्रा 1859 पीपीबी नए और ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। यह पूर्व औद्योगिक स्तर से 257 फीसदी ज्यादा है। वहीं नाइट्रस ऑक्साइड की वायुमंडल में मात्रा का स्तर 2017 में 329.9 पीपीबी रहा। यह पूर्व औद्योगिक स्तर का 122 फीसदी ज्यादा है। इनके अलावा ओज़ोन परतों को नुकसान पहुंचाने वाली सीएफसी-11 गैसों का स्तर भी वायुमंडल में काफी अधिक बढ़ गया है।

जहां तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जक देशों का सवाल है तो अमरीका सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। इसके बाद रूस, जापान, यूरोपियन देशों और चीन का नंबर आता है।

भारत में वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन मात्र 1.2 टन प्रति व्यक्ति साल है। फिर भी हमें भविष्य में पृथ्वी के वजूद के लिए सावधान रहने की आवश्यकता है। इस रिपोर्ट में चिंता जाहिर की है कि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों में कटौती किए बिना जलवायु परिवर्तन का खतरा बहुत तेज़ी के साथ बढ़ता जाएगा। इस समस्या से मुकाबला करने के अवसर लगभग खत्म हो चुका है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।

वहीं कुछ समय पहले जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पेनल द्वारा भी इस प्रकार की एक विशेष रिपोर्ट जारी की गई थी। तब पेनल को विशेष रूप से ग्लोबल वार्मिंग पर पेरिस समझौते में तय किए गए 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान की वैज्ञानिक व्यावहारिकता का पता लगाने को कहा गया था। इस रिपोर्ट में भी पृथ्वी के भविष्य की खतरनाक तस्वीर उजागर की गई थी।

गौरतलब है कि यदि ये गैसें अनुपस्थित हों और ये ताप का अवशोषण न करें तो धरती ठंडे ग्रह में तब्दील हो जाएगी। आज के दौर में इन गैसों में हो रही बेतहाशा वृद्धि धरती के तापमान को बढ़ा रही है, जिससे धरती के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। पिछले कुछ सालों में धरती के तापमान में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यह भी सच है कि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में बढ़ोतरी और तापमान में वृद्धि के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। जिस तरह तापमान बढ़ रहा है, इसका विपरीत असर कृषि में भी देखने को मिल रहा है। वायुमंडल में गैसों का हिसाब गड़बड़ा गया है। विकास की आंधी ने आसमान को जहरीले धुएं से भर दिया है।

यदि अब भी इस तरह ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का अनवरत रूप से बढ़ना जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी अपने विनाश की ओर अग्रसर हो जाएगी। ऐसे हालात में एक समय ऐसा आएगा, जब पृथ्वी में चारों तरफ त्राहि-त्राहि का मंजर होगा। ऐसे में ज़रूरत है कि तमाम देश बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के पुख्ता इंतज़ाम करें और पृथ्वी को खोने से बचाएं। वहीं जल्द पोलैंड में जलवायु शिखर सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है। ऐसे में विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट और पेनल की रिपोर्ट काफी मायने रखती है।

 

– कुशाग्र वालुस्कर

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