अपराधियों को राजनीति में आने से रोकना होगा…

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भारत सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, लेकिन भारत की सबसे बड़ी परेशानी है कि यहां अपराधी राजनेता बन जाते हैं  और ईमानदार व्यक्ति हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। भारत को आज़ाद हुए सत्तर साल बीतने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने चाहा भी कि अपराधी किस्म के लोगों के राजनीति में आने से रोक लगाई जा सके, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। कोर्ट ने कहा कि उसे पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है। वह सिर्फ संसद द्वारा बनाए गए कानून की व्याख्या कर सकता है। कानून बनाने का पूरा अधिकार संसद के दोनों सदनों को और विधानसभाओं को है। सुप्रीम कोर्ट इसमें कोई दखलअंदाजी नहीं कर सकता।

इससे लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस संबंध में कानून बनाने को कहा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी अच्छी तरह से जानता है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी यह नहीं चाहेगी कि अपराधी किस्म के व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोका जाए। अभी तक ऐसी कोई पार्टी नहीं है, जिसका कोई भी उम्मीदवार अपराधी किस्म का नहीं है और उन्होंने उसे टिकट न दिया हो। संसद और विधानसभाओं में बढ़ता प्रतिशत न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के लिए चिंता का विषय है बल्कि समाज़ के लिए भी चिंतनीय विषय है।

संविधान और प्रजातंत्र ने इतनी शक्तियां दे रखी हैं कि जो भी राजनीतिक दल सरकार में आता है, उसका पूरा-पूरा दुरुपयोग करता है। देशसेवा, गरीब, बेरोजगारी, भुखमरी ये सब कहकर राजनेता अपना उल्लू सीधा करते हैं। वह समय भी दूर नहीं, जब सारे अपराधी राजनीति में होंगे और सज्जन और ईमानदार लोग ज़ेल की सलाखों के पीछे।

अब मतदाताओं को जागरूक होना होगा। किसी भी अपराधी को विधानसभा और संसद में जाने से रोकना होगा। जनता अगर ठान ले कि अपराधी किस्म के उम्मीदवार को वोट नहीं देंगे चाहे वह किसी भी पार्टी का क्यों न हो। जब पूरे मतदाता ठान लें तो, जो काम सुप्रीम कोर्ट नहीं कर पाया वह काम मतदाताओं के एक-एक वोट सिद्ध कर दिखा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट भले ही उन्हें रोक नहीं पाया हो, लेकिन उसने ये निर्देश ज़रूर दिए हैं कि चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी को अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी ताकि मतदाता उनकी छवि अच्छी तरह से जान सकें।

लगता नहीं है कि इससे कोई फायदा होने वाला है। अपराधी होना राजनीति में एक फैशन सा बन गया है। कानून बन भी जाए तो सरकार के पास इतनी ताकत है कि वह या तो उसमें संशोधन कर सकती है या अध्यादेश के द्वारा उसका उपयोग कर सकती है। वर्तमान में हर राजनीतिक पार्टियों का एक ही कहना है कि जब तक कोई व्यक्ति का अपराध अदालत में सिद्ध नहीं हो जाता, वह अपराधी नहीं है। अब इस बदलाव के लिए देश के युवाओं को ही आगे आना होगा। युवाओं को ही अपने स्वयं के विवेक से काम लेकर ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना होगा वरना सिस्टम में कोई बदलाव नहीं होगा। सिर्फ कपड़े बदलेंगे, लेकिन चरित्र नहीं बदलेगा।

– कुशाग्र वालुस्कर

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