रावण के बजाय दुष्कर्मियों और आतंकवादियों को जलाएं

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तेरे भीतर छिपा है रावण, ऐ इंसान जमाने से,

और तू खुश है फ़क़त पुतला बाहर जलाने से 

वर्तमान सन्दर्भ में यह पंक्तियां एकदम सटीक बैठती हैं| विजयादशमी के अवसर पर शाम के समय सभी रावण के पुतला दहन कार्यक्रम को देखने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर एकत्र होते हैं| दहन के पश्चात सभी हर्षोल्लास से भर उठते हैं और एक-दूसरे को बधाइयां देते हैं कि रावण का अंत हो गया है, अब चैन से रहेंगे| इस बारे में किसी ने क्या खूब लिखा है|

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“हर साल जलाते हैं रावण, सोचते हैं हो गया अंत |

मन के अन्दर देखो तो रावण भरे अनंत ||” 

आजकल आए दिन दुष्कर्म, आतंकवाद, हत्या जैसी घटनाएं घट रही हैं| इन घटनाओं के बारे में जानकर मानवीयता और रिश्तों पर से विश्वास उठने लगा है| पिछले कुछ दिनों में बाहरी तत्वों को तो छोड़िए, पिता, भाई और चाचा जैसे करीबियों द्वारा मासूम बच्चियों की इज्जत को तार-तार करने के मामले सामने आए हैं| हमारे समाज में ऐसे पाशविक प्रवृत्ति के लोग निवास कर रहे हैं और हम रावण को जलाने की बात करते हैं|

अत्यंत विद्वान था रावण

रावण तो अत्यंत विद्वान, चारों वेदों का ज्ञाता और ज्योतिष विद्या में निपुण था। रावण की तरह प्रखर बुद्धि वाले किसी भी प्राणी ने आज तक पृथ्वी पर जन्म नहीं लिया है। रावण की विद्वता से प्रभावित होकर भगवान शंकर ने अपने घर की वास्तुशांति के लिए पंडित के रूप में दशानन को निमंत्रण दिया था। सेतु निर्माण के समय रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की गई तो उसके पूजन के लिए किसी विद्वान की आवश्यकता थी| पूरी पृथ्वी पर उस समय सबसे विद्वान ब्राह्मण रावण ही था, इसलिए भगवान राम ने उससे शिवलिंग की स्थापना करवाने का अनुरोध किया था और उसने शत्रुओं के आमंत्रण को स्वीकारा था। इसके बावजूद हम रावण का दहन करते हैं|    

रावण रसायन शास्त्र का ज्ञाता था। वह आयुर्वेद की जानकारी भी रखता था और एक महान कवि भी था। उसके द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र इसका अनुपम उदाहरण है| वह वीणा बजाने में भी सिद्धहस्त था। उसने एक वाद्य भी बनाया था, जिसे बेला कहा जाता था। इस यंत्र को वायलिन का ही मूल और प्रारम्भिक रूप मान सकते हैं। इस वाद्य को ‘रावण हत्था’ भी कहते हैं। स्वयं राम ने रावण की बुद्धि और बल की प्रशंसा की, इसलिए जब रावण मृत्यु-शैय्या पर था, तब राम ने लक्ष्मण को रावण से सीख लेने के लिए कहा था। इसके बावजूद हम रावण का दहन करते हैं|  

ज्योतिष विद्या में पारंगत होने के कारण रावण ने अपनी कुण्डली देखकर जान लिया था कि उसे कोई नहीं मार सकता है| सिर्फ भगवान राम के हाथों ही उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी, इसी कारण उसने शूर्पनखा के माध्यम से राम को शत्रु बनाया और माता सीता का अपहरण किया| भगवान राम की अर्धांगिनी माता सीता को रावण ने 2 वर्ष तक अपनी कैद में रखा था, लेकिन दौरान उसने माता सीता को छुआ तक नहीं था| इसके बावजूद हम रावण का दहन करते हैं|   

कुकर्मी और आतंकवादी फैला रहे अशांति 

आज समाज में इतने कुकर्मी और आतंकवादी अशांति फैला रहे हैं| पिछले 5 साल में 61 फीसदी दुष्कर्म बढ़े हैं। इनमें नाबालिगों से जुड़े मामलों में 133 फीसदी इजाफा हुआ है। हर रोज 46 नाबालिग बच्चियां दुष्कर्म का शिकार हो रही हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 के बाद पांच साल में दुष्कर्म के कुल मामले 61 फीसदी बढ़ गए हैं।  2011 में नाबालिगों से दुष्कर्म के 7228 मामले सामने आए थे, जबकि 2016 में ऐसे 16863 मामले दर्ज हुए। इससे पता चलता है कि देश में रोजाना ही औसतन 46 से ज्यादा नाबालिग दुष्कर्म का शिकार हो रही हैं। हाल ही में मुजफ्फरपुर की घटना पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज मदन बी लोकुर ने कहा कि दुष्कर्म की सबसे ज्यादा घटनाएं मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में हो रही हैं।

आज आतंकवाद भी हमारे देश के लिए नासूर बन चुका है| ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2015 (जीटीआई) के अनुसार 2014 में आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित 162 देशों में भारत का छठा स्थान रहा। भारत में आतंकवाद से जुड़ी मौतों में 1.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और मरने वालों की संख्या 416 रही। यह संख्या 2010 में हुई आतंकी घटनाओं और मौतों के बाद से सबसे ज्यादा है|

इन्हें जलाएं

जलाना है तो इन दुष्कर्मियों, युवाओं को बरगलाकर उन्हें आतंकवाद की खाई में धकेल रहे आतंकी संगठनों के सरगनाओं को जलाएं |

जलाना है तो इनको जलाएं, जो अपनी ही थाली में छेद कर रहे हैं| रावण की विद्वत्ता के आगे इन अज्ञानियों की क्या बिसात, जो सगे रिश्तों तक को कलंकित कर रहे हैं|

जलाना है तो हमारे देश में रहकर पाकिस्तानियों और अन्य देशद्रोहियों का साथ देने वाले इन आतंकियों और बहू-बेटियों की अस्मत तार-तार करने वाले इन पापियों को जलाएं|

“क्यों हर साल जलाते हो रावण

क्यों करते हो उसका दहन

निकृष्ट पापियों को जलाने का

इस पल से ही लें सब प्रण”

-अंकुर उपाध्याय

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