क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री निष्पक्ष सरकार चला पाएंगे?

0

हो सकता है भविष्य में इमरान खान भी नवाज़ शरीफ के नक़्शे कदम पर चलने लगें, लेकिन जिस तरह उनकी पार्टी को बढ़त मिली है उनका प्रधानमंत्री बनना तय है। मेरी दिली तमन्ना भी है कि क्रिकेट जगत का ये आलराउंडर अब पाक और भारत के बीच रिश्तों की नई इबारत लिखने का श्रेय ले। जैसे हमारे यहां गीत गूंजता रहता है, ‘मेरा देश बदल रहा है’, वैसे ही पाकिस्तान के चुनाव परिणाम और इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं बता रही हैं कि पाकिस्तान के अवाम का दिलोदिमाग़ भी हाल के वर्षों में बदला है। या यूं कहें कि वहां जो बदलाव की बयार बहती नजर आ रही है, वो हवाएं इधर से ही गई हैं। चार साल पहले भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर भाजपा ने देश का दिल जीता था। नवाज़ शरीफ और बेटी मरियम के जेल जाने के बाद चुनाव में वहां भी भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा बना। इससे बड़ा असर क्या होगा कि पाकिस्तान में नरेंद्र मोदी के जिक्र बिना प्रचार पूरा नहीं होता था।

हालांकि सेना के कंधों पर चढ़कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले इमरान खान के लिए अपने वादों को पूरा करना इतना आसान भी नहीं है। उनकी पार्टी पीटीआई को गठबंधन करना पड़ेगा तब ही इमरान खान प्रधानमंत्री पद की शपथ ले सकेंगे। ये बिल्कुल भारत जैसे नतीजे और पहली गठबंधन सरकार जैसे हालात होंगे। सेना के दखल बिना वहां सरकार कोई फ़ैसले लागू करने में सक्षम भले ही नहीं रहे, लेकिन जिस तरह मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड और लशकर-ए-तैयबा के मुखिया हाफिज सईद का एक भी उम्मीदवार जीत हासिल नहीं कर पाया, खुद उसका बेटा हाफिज तल्हा और दामाद खालिद वलीद भी हार गए, इससे यह भी पता चलता है कि पाकिस्तानी सेना ब्रेन वॉश कर आतंकवादी तो तैयार कर सकती है लेकिन अमनपसंद लोगों का माइंड सेट नहीं कर सकती।

यही कारण रहा कि सईद ने जिन 265 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, एक भी नहीं जीता। पाकिस्तान की जनता ने हाफिज सईद को उसकी औक़ात दिखाकर एक तरह से सेना द्वारा पाले जाने वाले आतंकी संगठनों के मुग़ालते दूर कर दिए हैं। चुनाव के इस परिणाम के बाद बहुत संभव है कि चीन-अमेरिका का इन संगठनों के प्रति जो अदृश्य प्रेम रहा है वह भी कम हो जाए।

क्रिकेट मैदान के आलराउंडर इमरान खान जिन बाक़ी मामलों में ‘आलराउंडर’ हैं उन सारे मामलों में नरेंद्र मोदी की कमज़ोरी ही एक सशक्त प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें पड़ोसी मुल्क सहित अन्य मुस्लिम देशों में भी लोकप्रिय बना रही है। जिस तरह संसद में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को गले लगाकर देश को चौंकाया था, कुछ ऐसे ही अंदाज में बिन बुलाए मेहमान की तरह मोदी भी नवाज शरीफ को गले लगाने पहुंच गए थे। अब जब इमरान खान प्रधानमंत्री हो जाएंगे तब कम से कम गले मिलने का दायित्व भारत सरकार की तरफ़ से कपिल देव और रवि शास्त्री को दे देना चाहिए, ये दोनों उनके पक्के दोस्त हैं। बचपन से क्रिकेट के लिए जुनून रखने वाला इमरान खान पाक क्रिकेट टीम का कप्तान बन जाए और अधेड़ होने की दहलीज़ पर कदम रखने के दौरान (1992) में विश्वकप जीत कर अपनी कप्तानी को यादगार बना दे, यही दृढ़इच्छा शक्ति 1996  में पाकिस्तान ‘तहरीक इस्लाम पार्टी’ के गठन के बाद से अब तक के राजनीतिक संघर्ष के बाद मिली इस अपार सफलता में फिर नजर आई है।

विवादों और अय्याशी वाले उनके चरित्र के अलावा  इमरान खान का एक उजला पक्ष और भी है| अपनी मां शौकत खानम की स्मृति में पाकिस्तान में सबसे बड़े कैंसर हॉस्पिटल का निर्माण। 1992 में पाक टीम ने जिस अप्रत्याशित तरीक़े से विश्वकप हमसे छीना था उसके पीछे इमरान का एक श्रेष्ठतम टीम लीडर के रूप अपनी टीम के सामने आंसू बहाना भी था कि यदि विश्वकप हम नहीं जीते तो चैरिटी मैच नहीं करा सकूंगा और कैंसर अस्पताल का सपना पूरा नहीं हो सकेगा। पाकिस्तान में क्रिकेट और टीम अब जितनी बदनाम है उतनी तब नहीं थी। इमरान खान की कप्तानी में न मैच फ़िक्स हुए न खिलाड़ी मोहरा बने, क्रिकेट मैदान की यह उपलब्धि अब सरकार चलाने में काम आए यह लगता नहीं। विपक्षी दल तो चुनाव के वक्त से ही आरोप लगाते रहे हैं कि सेना इमरान खान की मदद कर रही है। खुद इमरान को विरोधी तालिबान खान के नाम से इसीलिए पुकारते रहे हैं कि जब भी सरकार ने पाक में आतंकियों के ख़िलाफ़ सख्त अभियान चलाया इमरान उस कार्रवाई के विरोध में खड़े हो गए।

22 साल के संघर्ष के बाद इमरान पर अवाम ने भरोसा किया है, तो भ्रष्टाचार और दहशतगर्दी से मुक्त अमनपसंद पाक का सपना पूरा करने के लिए। सेना के नियंत्रण के चलते इमरान यह कैसे कैसे करके दिखाएंगे यह उनके लिए वैसी ही चुनौती है, जैसी मोदी के लिए है कि तमाम अच्छे काम गिनाने के बाद भी देश ‘अच्छे दिन आने’ का यक़ीन चार साल बाद भी नहीं कर पाया है। जुमले वाली सरकार का ठप्पा शायद उसी दिन हटे जिस दिन हर व्यक्ति के बैंक खाते में 15 लाख जमा हो जाएं| इमरान खान यदि किए गए वादे पूरे करने में सेना की अनदेखी करते हैं तो उन्हें भूतपूर्व या शहीद होने में वक्त नहीं लगेगा। बदलाव की हवाएं यदि यहां से वहां गईं हैं तो जुमले वाली सरकार जैसी आवाज़ें वहां कब तक थमी रहती हैं, यह वक्त बताएगा क्योंकि इमरान का सत्ता संभालना शेर की सवारी करने जैसा ही है।

कीर्ति राणा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

Share.