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40 बार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित हुए थे Anand Bakshi

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उदित नारायण, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति और एसपी बालसुब्रमण्यम जैसे अनेक गायकों का पहला गीत लिखने वाले, न जाने कितने अफसानों को नगमों की माला में पिरोने वाले, न जाने कितने जज्बातों को लफ्जों की शक्ल देने वाले, 40 बार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित होने वाले आनंद बख्शी की जितनी भी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है |

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40 साल से भी ज्यादा लंबा फिल्मी सफर और चार हजार से भी ज्यादा गीत खुद ही बता देते हैं कि आनंद बख्शी ने जो रचा, उसका दायरा कितना विशाल था| शमशाद बेगम हों या अलका याग्निक या मन्ना डे या फिर कुमार सानू| गायक आते-जाते रहे, उनके लिए शब्द रचने वाला यह गीतकार वहीं रहा| आज उनके जन्मदिन पर हम आपको बताएंगे उनके जीवन से जुड़ी ख़ास बातें |

आनंद बख्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ था | वे गीतकार के साथ-साथ गायक भी बनना चाहते थे| अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वे 14 साल की उम्र में घर से भागकर मुंबई आ गए| शुरुआत में मौका नहीं मिला तो ज़िंदगी चलाने के लिए उन्होंने कई साल तक पहले नौसेना और फिर सेना में काम किया|

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1958 में उन्हें पहला ब्रेक मिला| भगवान दादा की फिल्म ‘भला आदमी’ के लिए उन्होंने चार गीत लिखे| फिल्म तो नहीं चली, लेकिन गीतकार के रूप में उनकी पहचान बन गई| इसके बाद उन्हें फिल्में मिलती रहीं| ‘काला समंदर’, ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ’ जैसी फिल्मों के लिए उनकी थोड़ी-बहुत चर्चा होती रही|

1965 में उनकी दो फिल्में ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब-जब फूल खिले’ आईं | इन दोनों फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को अचानक ही आसमान पर पहुंचा दिया| ‘मैं तो एक ख्वाब हूं’ से लेकर ‘परदेसियों से न अंखियां मिलाना’ जैसे गाने जन-जन की पसंद बन गए| इसके बाद आराधना, कटी पतंग, शोले, अमर अकबर एंथनी, हरे रामा हरे कृष्णा, कर्मा, खलनायक, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, ताल, गदर-एक प्रेमकथा और यादें तक चार दशक से भी ज्यादा समय तक वे अपने गीतों से प्रशंसकों को आनंद के सागर में गोते लगवाते रहे|

आनंद बख्शी की सबसे खास बात थी कि बहुत आम सी परिस्थितियों से वे गीत खोज लाते थे| मसलन, सिकंदर और पोरस का एक नाटक देखने के दौरान पोरस को सिकंदर के सामने बंधा देख उन्होंने लिखा–मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए| यह गीत खासा मशहूर हुआ|

‘बड़ा नटखट है किशन कन्हैया’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘आदमी मुसाफिर है’, ‘दम मारो दम’ और ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम’ तक आनंद बख्शी ने चार हजार से भी ज्यादा गीत रचे| उनकी रफ्तार इतनी तेज थी कि एक साक्षात्कार में मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत ने कहा था कि जहां दूसरे गीतकार गीत लिखने के लिए सात-आठ दिन ले लेते हैं वहीं आनंद बख्शी आठ मिनट में गाना लिख देते हैं|

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फिल्म ‘मोम की गुड़िया’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ उन्होंने अपना पहला गाना गाया–’मैं ढूंढ रहा था सपनों में’| निर्देशक मोहन कुमार को वह गाना इतना अच्छा लगा कि उन्होंने ऐलान कर दिया कि आनंद बख्शी, लता मंगेशकर के साथ एक युगल गीत भी गाएंगे| यह गाना था– ‘बागों में बहार आई, होठों पे पुकार आई’| यह खूब चला भी| इसके बाद तो उन्होंने शोले, महाचोर, चरस और बालिका वधू जैसी कई फिल्मों के गीतों को अपनी आवाज दी|

आनंद बख्शी सिगरेट बहुत पीते थे| इस कारण उन्हें फेफड़ों और दिल की तकलीफ हो गई| 30 मार्च, 2002 को 72 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन आम आदमी की भावनाओं को जुबान देने वाले उनके गीत अमर हैं|

सुनें आनंद बख्शी के चुनिंदा गीत 

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