अमित शाह डरे हुए हैं या शिवराज !

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क्या वाक़ई मध्यप्रदेश में भाजपा की हालत ख़राब है या अमित शाह भोपाल, जबलपुर की यात्राओं के बाद संगठन-सत्ता में तालमेल न होने जैसा फ़ीडबैक प्रचारित करवा कर शिवराज को डरा रहे हैं? कुछ समय पहले तक मोदी से लेकर शाह तक मुख्यमंत्रियों के सम्मेलनों से लेकर दिल्ली में होने वाली संगठन की बैठकों में शिवराज के कामों-जनहितकारी योजनाओं को लेकर तारीफ़ करते नहीं थकते थे। शिवराज को बदले जाने जैसे प्रश्न पर पत्रकारों को भस्म कर देने वाली निगाहों से देखने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष आत्मविश्वास से दावा करते थे शिवराज के नेतृत्व में ही चुनाव होंगे और चौथी बार भी भाजपा की ही सरकार बनेगी। चार-छह महीनों में अब ऐसा क्या हो गया कि अमित शाह को लगभग हर महीने एक बार तो मप्र की परिक्रमा करना ही पड़ रही है। वो नहीं आएं तो कभी रामलाल आ जाते हैं तो कभी संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी।माना कि नंदू भैया शिवराज की जेब में थे, राकेश सिंह पर तो आलाकमान का वरदहस्त है।

नरेंद्र सिंह तोमर रहे होंगे कभी शिवराज के जोड़ीदार अभी तो शाहजी के हुकम में हैं।फिर इतनी घबराहट क्यों, क्यों फूल रही हैं सासें, सरकारी योजनाओं की सक्सेस स्टोरी क्यों खोखली मानी जा रही है।क्यों इंदौर से लेकर भोपाल, दिल्ली तक यह प्रचारित हो रहा है कि मप्र में भाजपा की हालत ख़राब है।जिन योजनाओं को आदर्श और रोल मॉडल मान कर केंद्र ने सराहा, संशोधन कर 48 महीने की अपनी सफलता में बढ़ चढ़कर बताया उन सारी योजनाओं की सच्चाई पर क्यों संदेह किया जा रहा है।कहाँ तो युवा, दलित, किसान महिला, बेटी-मामा, विधवा, फ़सल, ऋण आदि योजनाओं को कल तक शासन की उपलब्धि माना जा रहा था।ऐसा क्या होने लगा कि सरकार की ऐसी सारी जनहितकारी योजनाओं में एंटी इंकंबेंसी, सत्ता विरोधी लहर से जोड़ा जा रहा है। क्या दिल्ली को पूर्वानुमान हो चला है कि अब मध्यप्रदेश में उसकी जीत की संभावना नहीं है फिर भी, आखिरी कोशिशें की जा रही हैं।

अमित शाह ने साफ संदेश दिया है कि इस बार शिवराज की जगह, संगठन के नाम पर चुनाव लड़ा जाएगा, क्योंकि इस बार लड़ाई कहीं ज्यादा कठिन है।जो सत्ता, संगठन के आगे इतनी असहाय हो कि इंदौर जैसी आर्थिक राजधानी से किसी विधायक कोमंत्री बनाने लायक नहीं समझे, शिवराज से सुमित्रा मुँह फुलाए रहें उसी पार्टी के ही लोगों को क्यों यह प्रचारित करना पड़ रहा है कि शिवराज के साथ दो उपमुख्यमंत्री और जोड़े जा सकते हैं।यह कौन प्रचारित करवा रहा है कि चुनावी चेहरा शिवराज नहीं होंगे और कम से कम 130 मौजूदा बीजेपी विधायकों के टिकट कट जाएंगे। मप्र में पार्टी नेताओं में बढ़ते विरोध के कारण ही क्या अमित शाह को संकेत देने पड़े कि इस बार संगठन के नाम पर चुनाव लड़ा जाएगा,  दो चुनाव (2009 और 2013) जिस चेहरे के दम पर जीते अब वह फेयरएंड लवली क्यों नहीं रहा पार्टी के लिए ? क्या यही कारण है कि सीएम की सलाहकार मंडली शिवराज के नाम और काम की उपयोगिता सिद्ध करने और योजनाओं के लाभ से अब तक अछूते रहे वर्गों को रिझाने के फार्मूले खोजने के काम में लग गई है और मुख्यमंत्री भी मानसून पूर्व बारिश की तरह लोकलुभावन योजनाओं की झड़ी लगा रहे हैं।  भेड़ाघाट में शाहजी ज्ञान देकर गए हैं किसानों, व्यापारियों और आदिवासियों को खुश करने पर जोर दिया जाए।अब कौन समझाए कि एक दशक से इसी दिशा में तो सरकार दौड़ दौड़ कर दुबली हुई जा रही है। शहर का सामान्य वर्ग का आदमी तो कलेक्टोरेट से लेकर पुलिस तक से दुत्कारा जा रहा है।इस वर्ग के वोट देने न देने से तो सरकार को फ़र्क़ पड़ता नहीं तो कौन चिंता करे।

-कीर्ति राणा 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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