चुनाव आते ही सभी मुद्दे बरसाती मेंढक की तरह बाहर

0

हिन्दुस्तान एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहां एक निश्चित अवधि में जनसमुदाय अपना नया सिपहसालार चुनती है । 2019 में लोकसभा चुनाव व 2018 में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव दस्तक दे रहा है। हाल ही में देश में गुजरात,कर्नाटक व मेंघालय की जनता ने अपना मतदान किया और अपनी सरकार चुनी| नतीजा कुछ भी आया हो, पर इन तीनो राज्यो में हर चुनाव की तरह जात-पात, तेरा-मेंरा का बोलबाला रहा, मुख्य विषय या यह कहें आम जनता के प्रश्न तो अछूते ही रह गए और अगले चुनाव तक अब इन राज्यों में विपक्ष को कोई मुद्दा नज़र भी नहीं आएगा और जनता की परेशानी जस की तस बनी रहेगी। 

चुनाव राजनेताओं व दलों के लिए आज सिर्फ सत्ता हासिल करने का एक जरिया बन कर रह गया  है| आम जनता की परेशानी तो इसमें ऐसे खो जाती है, जैसे सागर में मोती| पार्टियां व नेता वही मुद्दा उठाते हैं, जिससे तुष्टिकरण किया जाए, आम लोगों को बांटा जाए, नफरत का जहर घोला जाए, जिससे उनका उल्लू आसानी से सीधा हो जाए और वे सत्ता पर काबिज़ होकर अपना खजाना भरने में लग जाएं।

ऐसा नहीं कि सारा दोष इन्हीं का होता है| आम जनता भी कई बार भावनाओं में बहकर व गुमराह होकर इनके लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम बन जाती है| इन्हें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए क्योंकि हमारा अंकुश स्वयं तक सीमित है और साथ ही हम  स्वयं की   सोच तटस्थ और सकारात्मक नहीं रख पाते। प्रायः राजनीति से प्रदूषित सोच ही टकराव और विवाद का कारण बनती है और एक गलत प्रचार व विषय हमें अपने असली मुददे से भटका देता है।

2018 व  2019  में फिर देश में चुनावों की सरगर्मी है| कई महत्वपूर्ण राज्यों व देश में चुनाव होना है और पुनः एक नकारात्मक दृश्य आम जनता के सामने परोसा जा रहा है, जिसमें मौजूदा सरकार भी कम दोषी नहीं है और ऐसा ही चलता रहा तो निश्चित ही 2019 का चुनाव आते-आते हर आंदोलन व हर विपक्षी दल इतने  पीड़ित हो जाएंगे कि वे हर वस्तु, खाद्य पदार्थ, गैस व पेट्रोल की कीमतों के रोज आकलन करेंगे, जैसे ये सब मुददे व कीमतें रातोंरात बड़े हो। हर विषय को राजनीतिक दल व मीडिया टीवी पर चर्चा का माध्यम बनाकर टीआरपी व अपना प्रचार-प्रसार बढ़ाएंगे, जिससे जनता का न कोई सरोकार होगा और न  इससे जनता को कोई लाभ  पहुंचने वाला है ।

आजादी के 71 साल बाद भी देश में गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, समानता का अधिकार व आम जनता की बुनियादी जरूरतें जस के तस बनी हुई है और अब आज इन विषयों पर किसी भी दल ने इसे प्राथमिकता पर नहीं रखा| वो आज भी भेदभाव जात-पात, एक विशेष वर्ग के लोगों को प्रभावित करने व वोट बटोरने में लगी है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि  कहीं न कहीं धूमिल कर रही है। आज पुनः विपक्ष द्वारा वो गड़े मुद्दे उखाड़े जाएंगे, जिनका संबंध सिर्फ और सिर्फ राजनीति करने से होगा, जिससे वे सुर्खियां बटोर सकें,  सत्ता पक्ष के विरोध में एक नकारात्मक वातावरण निर्मित करने का प्रयास किया जाएगा और यह होना भी चाहिए, पर जनता के लिए जो मुददे आवश्यक हों, उन्हें प्राथमिकताओं के घेरे में लाकर न कि अपने निहित स्वार्थ व महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए।

ऐसा कहा जाता है कि  हिंदुस्तान एक विकासशील देश है, फिर हमारे यहां चुनाव व हर लड़ाई विकास व समानता के अधिकार पर क्यों नहीं होती ? क्यों आम जनता अपनी बुनियादी ज़रूरतों को चुनाव का हथियार बनाकर मतदान नहीं करती है ? क्यों 71 साल बाद भी हमारा देश उन देशों से पीछे है, जिनकी दुर्दशा  हमसे कई गुना बुरी थी और आज वे देश हमसे हर पटल पर  बहुत आगे निकल गए हैं ? इसका एकमात्र कारण है हमारे देश में तुष्टिकरण की राजनीति,  फूट डालो और शासन करो कि दुर्भाग्यपूर्ण नीति| हर व्यक्ति व राजनीतिक दल बस राज करना चाहता है, पर वह आम जनता की परेशानी व उनके प्रश्न को सुलझाना नहीं चाहता क्योंकि यदि यह सब  हल हो जाएगा तो इनकी दुकान व रोजी-रोटी चलेगी कैसे ?

बहरहाल, राष्ट्र के  लिए इस तरह के विषयों  पर चुनाव घातक है और विपक्ष भी चुनाव आते ही जागरूकता दिखता है, जिसे हर वक्त सशक्त रहकर सरकार से कार्य करवाना होता है, वह रुकावटें बढ़ाने व   अपना वर्चस्व सिद्ध करने में महत्वपूर्ण समय गवां देते हैं, साथ ही वोट की राजनीति राष्ट्र को प्रथम रखकर होनी चाहिए, जिसमें हर किसी की सुरक्षा  व समृद्धि की बात हो, सब को एक नज़र से देखने का नज़रिया राजनेताओं व उनके दलों को रखना होगा व आम जनता को भी हर विषय से ऊपर उठकर मतदान कर अपने प्रदेश व राष्ट्रहित में  प्रतिनिधि व सरकार चुननी होगी ।

-विशाल सक्सेना

Share.